"सूँ साँ माणस गंध", डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी का छठा कविता-संग्रह है ।
कवि, लोकतंत्र और कानून के एक तरफ़ा नजरिए से खफ़ा नजर आते हैं और अपना रोष
कुछ ऐसे व्यक्त करते हैं -
"उसे बंदूक चलाने की आजादी चाहिए
मेरी खोपड़ी उड़ाने के लिए
मेरे हाथ बंधे हैं, उसके खुले।"
साथ ही कवि ने अपने व्यंग्यात्मक अंदाज में कलुषित लोकतान्त्रिक व्यवस्था
और गैर-हितकारी नीतियों पर भरपूर भड़ास निकाली है । देश की वर्तमान दशा का
अक्स "सूँ साँ माणस गंध" की कविताओं में साफ़ दृष्टिगोचर होता है। एक
बानगी -
"बधाई स्वीकारें
कि शेष है साहस अभी
आपमें और हममें
लोकतंत्र के भगवानों के
गोल शयनकक्ष के भी
षडयंत्रों के नागपाश में
फँस जाने के बावजूद ।
बधाई स्वीकारें
कि बरकरार है बंधुता
आपकी और हमारी
लोकतंत्र के सफ़ेद कबूतर की गर्दन पर
तमामतर आतंकी कुचालों के
विषैले दाँतों और काले नाखूनों की
पैनी पकड़ के बावजूद ।"
कवि, देश में पनपे निराशावाद के लिए जनता को भी बराबर का जिम्मेदार मानते
हैं। ऐसी विकट घड़ी में वे लेखकों को भी अपने दायित्व के निर्वहन के लिए
तैयार रहने का आग्रह करते हैं ।
"प्रजा
ढल जाए जब अँगूठों की छाप में
और प्रतिनिधि
तब्दील होने लगें
शाश्वत सहमति की मुद्रा में
उठे हाथ में
लोक को
लील लें
जब कुर्सियाँ
और जेबें बड़ी होने लगें
सबसे बड़ी किताब से
तब समझो
समय आ गया है
कलम की
सही कार्यवाई का !"
रिश्ते और फ़र्ज़ के बीच एक महीन लकीर खींचते हुए कवि जब ये पंक्तियाँ रचते
हैं तब तमाम रिश्ते बरबस याद आ जाते हैं ।

"माँ अंतिम क्षण की प्रतीक्षा में थी
मुझे ट्रेन पकडनी थी ।"
मौत का चित्रण है,
जारी...
कवि, लोकतंत्र और कानून के एक तरफ़ा नजरिए से खफ़ा नजर आते हैं और अपना रोष
कुछ ऐसे व्यक्त करते हैं -
"उसे बंदूक चलाने की आजादी चाहिए
मेरी खोपड़ी उड़ाने के लिए
मेरे हाथ बंधे हैं, उसके खुले।"
साथ ही कवि ने अपने व्यंग्यात्मक अंदाज में कलुषित लोकतान्त्रिक व्यवस्था
और गैर-हितकारी नीतियों पर भरपूर भड़ास निकाली है । देश की वर्तमान दशा का
अक्स "सूँ साँ माणस गंध" की कविताओं में साफ़ दृष्टिगोचर होता है। एक
बानगी -
"बधाई स्वीकारें
कि शेष है साहस अभी
आपमें और हममें
लोकतंत्र के भगवानों के
गोल शयनकक्ष के भी
षडयंत्रों के नागपाश में
फँस जाने के बावजूद ।
बधाई स्वीकारें
कि बरकरार है बंधुता
आपकी और हमारी
लोकतंत्र के सफ़ेद कबूतर की गर्दन पर
तमामतर आतंकी कुचालों के
विषैले दाँतों और काले नाखूनों की
पैनी पकड़ के बावजूद ।"
कवि, देश में पनपे निराशावाद के लिए जनता को भी बराबर का जिम्मेदार मानते
हैं। ऐसी विकट घड़ी में वे लेखकों को भी अपने दायित्व के निर्वहन के लिए
तैयार रहने का आग्रह करते हैं ।
"प्रजा
ढल जाए जब अँगूठों की छाप में
और प्रतिनिधि
तब्दील होने लगें
शाश्वत सहमति की मुद्रा में
उठे हाथ में
लोक को
लील लें
जब कुर्सियाँ
और जेबें बड़ी होने लगें
सबसे बड़ी किताब से
तब समझो
समय आ गया है
कलम की
सही कार्यवाई का !"
रिश्ते और फ़र्ज़ के बीच एक महीन लकीर खींचते हुए कवि जब ये पंक्तियाँ रचते
हैं तब तमाम रिश्ते बरबस याद आ जाते हैं ।
"माँ अंतिम क्षण की प्रतीक्षा में थी
मुझे ट्रेन पकडनी थी ।"
मौत का चित्रण है,
जारी...

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