Saturday, 4 April 2015

घुघूती घुरौण लगी - गढ़वाली से हिंदी में अनुदित !!

मेरे मायके की घुघूती बोलने लगी है
आते-आते चैत्र - ऋतु आ ही गयी

ऊँची पहाड़ियों की बर्फ पिघल चुकी होगी
और मेरे मायके का जंगल फिर हरा-भरा हो चुका होगा
पंछियाँ अपने घोंसलों को छोड़कर उड़ने लगी होंगी  
और बेटियाँ मायके जाने की तैयारियाँ कर रही होंगी

मेरे मायके की घुघूती बोलने लगी है...

जंगलों में बुरुंश के फूल खिल रहे होंगे
और चट्टानों पर फ्योंली के फूल मुस्कुरा रहे होंगे
फुल्यारी फूल-पत्तियां लेकर दहलीजों पर जा रही होंगी
और दोस्त-साथी थैड्या-चौखुल्या नृत्य कर रहे होंगे

मेरे मायके की घुघूती बोलने लगी है...

पिताजी आँगन में उदास बैठे होंगे
और माँ चढ़ती साँस के साथ रास्ता देख रही होगी
कब मेरे मायके के ढोल-वादक दिशा-भेंट आयेंगे
कब मेरे भाई-बहिनों की कुशल खबर लायेंगे

मेरे मायके की घुघूती बोलने लगी है...

Sunday, 29 March 2015

किसान और आत्महत्या - हरीशचन्द्र पाण्डे !!

उन्हें धर्मगुरुओं ने बताया था प्रवचनों में
आत्महत्या करने वाला सीधे नर्क जाता है
तब भी उन्होंने आत्महत्या की

क्या नर्क से भी बदतर हो गई थी उनकी खेती

वे क्यों करते आत्महत्या
जीवन उनके लिए उसी तरह काम्य था
जिस तरह मुमुक्षुओं के लिए मोक्ष
लोकाचार उनमें सदानीरा नदियों की तरह
प्रवहमान थे
उन्हीं के हलों के फाल से संस्कृति की लकीरें
खिंची चली आई थीं
उनका आत्म तो कपास की तरह उजार था
वे क्यों करते आत्महत्या

वे तो आत्मा को ही शरीर पर वसन की तरह
बरतते थे
वे कड़ें थे फुनगियाँ नहीं
अन्नदाता थे, बिचौलिये नहीं
उनके नंगे पैरों के तलुवों को धरती अपनी संरक्षित
ऊर्जा से थपथपाती थी
उनके खेतों के नाक-नक्श उनके बच्चों की तरह थे

वो पितरों का ऋण तारने के लिए
भाषा-भूगोल के प्रायद्वीप नाप डालते हैं
अपने ही ऋणों के दलदल में धँस गए 
वो आरुणि के शरीर को ही मेंड़ बना लेते थे
मिट्टी का
जीवन-द्रव्य बचाने
स्वयं खेत हो गए

कितना आसान है हत्या को आत्महत्या कहना
और दुर्नीति को नीति ।

Saturday, 28 March 2015

'अंधेरे में' - गजानन माधव मुक्तिबोध !!

ज़िन्दगी के...
कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;
आवाज़ पैरों की देती है सुनाई 
बार-बार....बार-बार, 
वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता, 
किन्तु वह रहा घूम 
तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक, 
भीत-पार आती हुई पास से, 
गहन रहस्यमय अन्धकार ध्वनि-सा 
अस्तित्व जनाता
अनिवार कोई एक,
और मेरे हृदय की धक्-धक् 
पूछती है--वह कौन 
सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई ! 
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से 
फूले हुए पलस्तर, 
खिरती है चूने-भरी रेत 
खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह-- 
ख़ुद-ब-ख़ुद 
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है, 
स्वयमपि 
मुख बन जाता है दिवाल पर, 
नुकीली नाक और 
भव्य ललाट है, 
दृढ़ हनु 
कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति। 
कौन वह दिखाई जो देता, पर 
नहीं जाना जाता है !! 
कौन मनु ? 

बाहर शहर के, पहाड़ी के उस पार, तालाब... 
अँधेरा सब ओर, 
निस्तब्ध जल, 
पर, भीतर से उभरती है सहसा 
सलिल के तम-श्याम शीशे में कोई श्वेत आकृति 
कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है 
और मुसकाता है, 
पहचान बताता है, 
किन्तु, मैं हतप्रभ, 
नहीं वह समझ में आता। 

अरे ! अरे !! 
तालाब के आस-पास अँधेरे में वन-वृक्ष 
चमक-चमक उठते हैं हरे-हरे अचानक 
वृक्षों के शीशे पर नाच-नाच उठती हैं बिजलियाँ, 
शाखाएँ, डालियाँ झूमकर झपटकर 
चीख़, एक दूसरे पर पटकती हैं सिर कि अकस्मात्-- 
वृक्षों के अँधेरे में छिपी हुई किसी एक 
तिलस्मी खोह का शिला-द्वार 
खुलता है धड़ से 
........................ 
घुसती है लाल-लाल मशाल अजीब-सी 
अन्तराल-विवर के तम में 
लाल-लाल कुहरा, 
कुहरे में, सामने, रक्तालोक-स्नात पुरुष एक, 
रहस्य साक्षात् !! 

तेजो प्रभामय उसका ललाट देख 
मेरे अंग-अंग में अजीब एक थरथर 
गौरवर्ण, दीप्त-दृग, सौम्य-मुख 
सम्भावित स्नेह-सा प्रिय-रूप देखकर 
विलक्षण शंका, 
भव्य आजानुभुज देखते ही साक्षात् 
गहन एक संदेह। 

वह रहस्यमय व्यक्ति 
अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है 
पूर्ण अवस्था वह 
निज-सम्भावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिमाओं की, 
मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव, 
हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह, 
आत्मा की प्रतिमा। 
प्रश्न थे गम्भीर, शायद ख़तरनाक भी, 
इसी लिए बाहर के गुंजान 
जंगलों से आती हुई हवा ने 
फूँक मार एकाएक मशाल ही बुझा दी- 
कि मुझको यों अँधेरे में पकड़कर 
मौत की सज़ा दी ! 

किसी काले डैश की घनी काली पट्टी ही 
आँखों में बँध गयी, 
किसी खड़ी पाई की सूली पर मैं टाँग दिया गया, 
किसी शून्य बिन्दु के अँधियारे खड्डे में 
गिरा दिया गया मैं
अचेतन स्थिति में !

सूनापन सिहरा, 
अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले उभरे, 
शून्य के मुख पर सलवटें स्वर की, 
मेरे ही उर पर, धँसाती हुई सिर, 
छटपटा रही हैं शब्दों की लहरें 
मीठी है दुःसह!! 
अरे, हाँ, साँकल ही रह -रह 
बजती है द्वार पर। 
कोई मेरी बात मुझे बताने के लिए ही 
बुलाता है -- बुलाता है 
हृदय को सहला मानो किसी जटिल 
प्रसंग में सहसा होठों पर 
होठ रख, कोई सच-सच बात 
सीधे-सीधे कहने को तड़प जाय, और फिर 
वही बात सुनकर धँस जाय मेरा जी-- 
इस तरह, साँकल ही रह-रह बजती है द्वार पर 
आधी रात, इतने अँधेरे में, कौन आया मिलने? 
विमन प्रतीक्षातुर कुहरे में घिरा हुआ 
द्युतिमय मुख - वह प्रेम भरा चेहरा -- 
भोला-भाला भाव-- 
पहचानता हूँ बाहर जो खड़ा है !! 
यह वही व्यक्ति है, जी हाँ ! 
जो मुझे तिलस्मी खोह में दिखा था। 
अवसर-अनवसर 
प्रकट जो होता ही रहता 
मेरी सुविधाओं का न तनिक ख़याल कर। 
चाहे जहाँ,चाहे जिस समय उपस्थित, 
चाहे जिस रूप में 
चाहे जिन प्रतीकों में प्रस्तुत, 
इशारे से बताता है, समझाता रहता, 
हृदय को देता है बिजली के झटके !! 
अरे, उसके चेहरे पर खिलती हैं सुबहें, 
गालों पर चट्टानी चमक पठार की 
आँखों में किरणीली शान्ति की लहरें 
उसे देख, प्यार उमड़ता है अनायास! 
लगता है-- दरवाजा खोलकर 
बाहों में कस लूँ, 
हृदय में रख लूँ 
घुल जाऊँ, मिल जाऊँ लिपटकर उससे 
परन्तु, भयानक खड्डे के अँधेरे में आहत 
और क्षत-विक्षत, मैं पड़ा हुआ हूँ, 
शक्ति ही नहीं है कि उठ सकूँ जरा भी 
(यह भी तो सही है कि 
कमज़ोरियों से ही लगाव है मुझको)
इसीलिए टालता हूँ उस मेरे प्रिय को 
कतराता रहता, 
डरता हूँ उससे। 
वह बिठा देता है तुंग शिखर के 
ख़तरनाक, खुरदरे कगार-तट पर 
शोचनीय स्थिति में ही छोड़ देता मुझको। 
कहता है-"पार करो पर्वत-संधि के गह्वर, 
रस्सी के पुल पर चलकर 
दूर उस शिखर-कगार पर स्वयं ही पहुँचो" 
अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा, 
मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से 
बजने दो साँकल!! 
उठने दो अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले, 
वह जन वैसे ही 
आप चला जायेगा आया था जैसा। 
खड्डे के अँधेरे में मैं पड़ा रहूँगा 
पीड़ाएँ समेटे !! 
क्या करूँ क्या नहीं करूँ मुझे बताओ, 
इस तम-शून्य में तैरती है जगत्-समीक्षा 
की हुई उसकी 
(सह नहीं सकता) 
विवेक-विक्षोभ महान् उसका 
तम-अन्तराल में (सह नहीं सकता) 
अँधियारे मुझमें द्युति-आकृति-सा 
भविष्य का नक्षा दिया हुआ उसका 
सह नहीं सकता !! 
नहीं, नहीं, उसको छोड़ नहीं सकूँगा, 
सहना पड़े--मुझे चाहे जो भले ही। 

कमज़ोर घुटनों को बार-बार मसल, 
लड़खड़ाता हुआ मैं 
उठता हूँ दरवाज़ा खोलने, 
चेहरे के रक्त-हीन विचित्र शून्य को गहरे 
पोंछता हूँ हाथ से, 
अँधेरे के ओर-छोर टटोल-टटोलकर 
बढ़ता हूँ आगे, 
पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव, 
हाथों से महसूस करता हूँ दुनिया, 
मस्तक अनुभव करता है, आकाश 
दिल में तड़पता है अँधेरे का अन्दाज़, 
आँखें ये तथ्य को सूँघती-सी लगतीं, 
केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी। 
आत्मा में, भीषण 
सत्-चित्-वेदना जल उठी, दहकी। 
विचार हो गए विचरण-सहचर। 
बढ़ता हूँ आगे, 
चलता हूँ सँभल-सँभलकर, 
द्वार टटोलता, 
ज़ंग खायी, जमी हुई जबरन 
सिटकनी हिलाकर 
ज़ोर लगा, दरवाज़ा खोलता 
झाँकता हूँ बाहर.... 

सूनी है राह, अजीब है फैलाव, 
सर्द अँधेरा। 
ढीली आँखों से देखते हैं विश्व 
उदास तारे। 
हर बार सोच और हर बार अफ़सोस 
हर बार फ़िक्र 
के कारण बढे हुए दर्द का मानो कि दूर वहाँ, दूर वहाँ 
अँधियारा पीपल देता है पहरा। 
हवाओं की निःसंग लहरों में काँपती 
कुत्तों की दूर-दूर अलग-अलग आवाज़, 
टकराती रहती सियारों की ध्वनियों से। 
काँपती हैं दूरियाँ, गूँजते हैं फ़ासले 
(बाहर कोई नहीं, कोई नहीं बाहर) 

इतने में अँधियारे सूने में कोई चीख़ गया है 
रात का पक्षी 
कहता है-- 
"वह चला गया है, 
वह नहीं आएगा, आएगा ही नहीं 
अब तेरे द्वार पर। 
वह निकल गया है गाँव में शहर में। 
उसको तू खोज अब 
उसका तू शोध कर! 
वह तेरी पूर्णतम परम अभिव्यक्ति, 
उसका तू शिष्य है(यद्यपि पलातक....) 
वह तेरी गुरू है, 
गुरू है...."