Friday, 27 September 2013

लंचबॉक्स - फ़िल्म समीक्षा !

             'लंच बॉक्स', लीक से हटकर बनी एक अनोखी फिल्म है | गिने-चुने किरदार, सीमित संवाद और किरदारों का बढ़िया निर्वहन |  फिल्म में दृश्यों की अनावश्यक खींचातानी से परहेज किया गया है | फिल्म के केंद्र में एक लंच-बॉक्स है और उसके दो सिरे जुड़े हैं रिटायर्मेंट के करीब पहुँच चुके एक सरकारी कर्मचारी और एक गृहणी से |  ये लंच-बॉक्स दोनों का पोस्ट-ऑफिस है जो मोबाइल के दौर में भी चिट्ठियाँ आदान-प्रदान करने के काम आता है |


    फिल्म शुरू होती है एक महिला 'ईला' (निम्रत कौर) के लंच-बॉक्स पैक करने से जो अपने विवाहित जीवन में पाक-कला के द्वारा रंग घोलना चाहती है |  फिर ये लंच-बॉक्स कई डिब्बेवालों के हाथों होते हुए अपने गंतव्य तक पहुँचता है | यह डिब्बा (लंच-बॉक्स), जो कि ईला ने तैयार किया था, 'श्री सावन फर्नान्डीज़' (इरफ़ान खान) के सामने रख दिया जाता है | फर्नान्डीज़ साहब अगले महीने सेवानिवृत्त होने वाले हैं | फर्नान्डीज़ लंच-बॉक्स खोलते हैं, खाना शुरू करते हैं और चट कर जाते हैं | डिब्बा बंद करके रख देते हैं | डिब्बेवाला डिब्बा घर पहुँचा देता है | ईला देखती है कि डिब्बा खाली होकर घर आया है तो फूली नहीं समाती और यह खुशखबरी देती है 'देशपांडे आंटी' को | देशपांडे आंटी फ़िल्म का अदृश्य किरदार हैं जो ईला से बात तो करती रहती हैं लेकिन पूरी फ़िल्म में नजर नहीं आती | शाम होते ही फर्नान्डीज़ घर पहुँचते हैं,  ईला दरवाजा खोलती है और दर्शक यहाँ पर पहली बार चौंक जाते हैं | ईला के पति के रूप में राजीव (नकुल वैद) घर पहुँचते हैं और फर्नान्डीज़ साहब अपने घर |

अपने पति के साथ बातचीत में ईला समझ जाती है कि डिब्बा उनके पति को नहीं बल्कि किसी और शख्स को  मिला है | इस राज़ से पर्दा उठाने के लिए अगले दिन वह फिर लंच-बॉक्स तैयार करती है और साथ में रखती है एक पत्र जिसमें कहती है कि "कल खाली डिब्बा भेजने के लिए शुक्रिया" |  यह सलाह देशपांडे  आंटी  की थी | जवाब में फर्नान्डीज़ लिखते हैं कि - "प्रिय ईला, आज खाने में नमक कुछ ज्यादा था" और यह सिलसिला चलता जाता है | ये पत्र प्रेम-पत्र नहीं हैं, सिर्फ़ एक-दूसरे से बातें साझा करने के माध्यम भर हैं | ये पत्र दो अजनबियों के बीच एक अनोखी दोस्ती का रिश्ता कायम करते है और तमाम सुख-दुःख व छोटी-छोटी बातें साझा होती हैं |

         फ़िल्म में तीसरा और महत्वपूर्ण किरदार है एक रंगरूट 'शेख' (नवाजुद्दीन सिद्धिकी) का जो कि फर्नान्डीज़ साहब से काम की ट्रेनिंग लेना चाहता है | फर्नान्डीज़ सर उसे टालते रहते हैं | फिर धीरे-धीरे शेख और मिस्टर फर्नान्डीज़ करीबी हो जाते हैं,  एक साथ लंच करते हैं, कभी-कभी लोकल ट्रेन में साथ घर जाते हैं |

तमाम पत्रों के बाद ईला और फर्नान्डीज़ मिलने का फैसला करते हैं लेकिन अपनी-अपनी उम्र और जिम्मेदारियों के चलते मिल नहीं पाते और न ही भूटान में शिफ्ट हो जाने के विचार को आगे ले जाते हैं | दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में एक-दूसरे की कमी महसूस करते हुए अकेले आगे बढ़ जाते हैं |

घर और ऑफिस के बीच घूमते लंच-बॉक्स की कहानी अच्छी है | फ़िल्म विषय से कभी भटकती नहीं है | 'रितेश बत्रा' ने एक लेखक और खास तौर से निर्देशक के रूप में बढ़िया काम किया है |

इरफ़ान खान एक बेहतरीन अभिनेता हैं और अपनी अन्य फिल्मों की तरह उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है |  नवाजुद्दीन भी एक बढ़िया कलाकार हैं | फ़िल्म में वे जब-जब स्क्रीन पर आते हैं, दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान खिल जाती है | इरफ़ान और नवाजुद्दीन की केमिस्ट्री लाजवाब है | निम्रत कौर एक घरुलू महिला के किरदार में औसत रही हैं |

इस फ़िल्म में शब्दों के संवाद कम और अभिनय के संवाद अधिक हैं | कुछ बेहतरीन डायलॉग्स हैं और पूरी फ़िल्म दर्शकों को हँसाती रहती है | व्यावसायिक हिंदी फिल्मों से इतर, लंच-बॉक्स में एक भी मौलिक गाना नहीं है | गानों की कोई जरुरत भी फिल्म में महसूस नहीं होती |

विश्व-स्तर पर पहले ही प्रशंसा बटोर चुकी यह फिल्म भारत की ओर से 'आस्कर' में भेजे जाने के लिए भी नामांकित हुई किन्तु गुजराती फिल्म 'दि गुड रोड' से पिछड़ गई | | यह फ़िल्म लम्बे समय तक दर्शकों के दिलों में रहेगी |

Wednesday, 25 September 2013

उत्तराखण्ड त्रासदी और निओविजन की मदद !

उत्तराखण्ड, हिमालय की गोद में बसा एक छोटा सा खूबसूरत प्रदेश | माँ गँगा और यमुना का मायका | एक देवस्थली जहाँ पर बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री और हेमकुंड साहिब जैसे पवित्र धाम स्थित हैं | इन धामों में प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु पहुँचकर शीश नवाते हैं |  ऋषिकेश और कुम्भनगरी हरिद्वार जैसे धार्मिक नगर आगंतुकों का खुले दिल से स्वागत करते हैं |

यही नहीं उत्तराखण्ड में मसूरी, औली, फूलों की घाटी, नैनीताल और कौसानी जैसे अनेकों पर्यटक स्थल हैं जहाँ देश-विदेश से हर वर्ष लाखों की संख्या में  पर्यटक घूमने-फिरने और छुट्टियाँ बिताने आते हैं |


हमेशा की तरह उत्तराखण्ड तमाम पर्यटकों और श्रद्धालुओं की आवाभगत में व्यस्त था कि अचानक किसी की नज़र लग गई | १६ जुलाई, २०१३ की शाम, जब केदारनाथ धाम में भोलेनाथ की पूजा-अर्चना चल रही थी, मंदिर की घंटियाँ बज रही थी, कुछ श्रद्धालु आरती में शामिल थे तो कुछ लोग होटल के कमरों में आराम कर रहे थे, बच्चे गलियों में इधर-उधर विचरण कर रहे थे कि तभी अचानक जोर की आवाज़ के साथ चट्टानों के बीच से एक विकराल नदी बहने लगी |  ये नदी अपने साथ बड़े-बड़े पत्थरों को बहाकर ला रही थी | इसका बहाव इतना तेज़ था कि किसी को सँभलने का भी समय नहीं मिला | केदार धाम में अफरा-तफरी मच गई | लोग बेतहाशा इधर-उधर दौड़ने लगे | देखते ही देखते ये विकराल जल धारा मंदिर तक पहुँच गई | लोग पानी में समाहित होने लगे | बच्चों के हाथ छूटने लगे और नदी का तीव्र प्रवाह उन्हें बहाकर ले जाने लगा | कुछ लोग जान बचाने के लिए आस-पास कि चट्टानों कि ओर दौड़े | जो लोग चट्टानों पर चढ़ गए, वे अपनी जान बचाने में सफल रहे, जो नहीं चढ़ पाए वे नदी की धारा के साथ बहते चले गए | परिवार के परिवार ख़त्म हो गये | बहुमंजिला भवन जमींदोज हो गए | पलभर में खूबसूरत केदारघाटी श्मसान हो गई | ये जल-प्रवाह केदारनाथ से नीचे स्थित रामबाड़ा और गौरीकुंड को भी काफी हद तक बहा ले गया | कुछ इसी प्रकार का भयावह दृश्य समूचे उत्तराखण्ड में नज़र आया |

गँगा, अलकनंदा, पिंडर, मन्दाकिनी और धौली, हर नदी अपने उफ़ान पर थी | समय के इस कुचक्र में हजारों जिंदगियां ख़त्म हो गयी | लाखों लोग जगह-जगह फँस गए जिन्हें सेना की लम्बी मशक्कत के बाद निकाला जा सका | यह बचाव कार्य कई दिनों तक अनवरत चलता रहा और इस विकट घडी में उत्तराखण्ड के ग्रामीणों ने यात्रियों की सेवा व मदद में कोई कसर नहीं छोड़ी | उनके घरों का राशन ख़त्म हो गया लेकिन यात्रियों को कष्ट न होने दिया |

सरकार द्वारा देश के अन्यत्र राज्यों के श्रद्धालुओं को सुरक्षित उनके घर तक पहुँचा दिया गया और काल में मुँह में शेष रह गए उत्तराखण्ड के ग्रामीण परिवार | वे परिवार जिन्होंने इस त्रासदी में अपने बेटों को खो दिया, वे परिवार जिनके सर से पिता का साया उठ गया, वे परिवार जिनके आय के स्थान ख़त्म हो गए, वे परिवार जहाँ सभी महिलाएँ विधवा हो गई, वे परिवार जिनके घर उजड़ गए और खेत-खलिहान नदी के उफ़ान द्वारा काट लिए गए |

वक्त गुजरा, सरकारी और गैर-सरकारी मदद ग्रामीणों तक पहुँचाई जाने लगी | इन सबके बावजूद कई गाँव और परिवार ऐसे रहे जहाँ सड़कें व पुल टूट जाने के कारण कोई मदद नहीं पहुँची | ऐसे ही गाँवों को ध्यान में रखकर उत्तराखण्ड की एक स्वयंसेवी संस्था 'नियोविजन फाउंडेशन' (Neo Vision Foundation), गजेन्द्र रमोला के नेतृत्व में सितम्बर,२०१३ को देहरादून से रुद्रप्रयाग जनपद के लिए रवाना हुई |

रुद्रप्रयाग ही वह जिला है जो इस जल-प्रलय में सबसे अधिक प्रभावित हुआ | वहाँ का दृश्य अभी भी दिल को कँपा  देता है | देहरादून से रुद्रप्रयाग के रास्ते में 'टीम नियोविजन' ने देखा कि सड़कें पूरी तरह टूटी हुई हैं | नदी किनारे स्थित घरों व दुकानों का नामोनिशान तक मिट चुका है | तमाम पुल बह चुके हैं | कई मकान टूटकर हवा में झूल रहे हैं | ऐसी परिस्थियों को पारकर 'टीम नियोविजन' कालीमठ पहुँची | वे परिवार जो अब तक किसी भी प्रकार की मदद से वंचित रह गए उन्हें चिन्हित किया गया | ये वे ग्रामीण परिवार हैं जहाँ सड़कें व पुल टूटी होने के कारण मदद के लिए कोई नहीं पहुँचा | 'टीम नियोविजन' २५-३० किलोमीटर का पैदल सफ़र तय कर इन गाँवों तक पहुँची | चिन्हित किये गए २५ परिवारों को चेक द्वारा आर्थिक मदद दी गयी और  ५० परिवारों को शॉल, चटाई, बर्तन, राशन के पैकेट और गर्म कपडे आदि वितरित किये गए |


गाँवों में लोग अपने टूटे हुए मकानों, खेत के पुस्तों की मरम्मत करते नज़र आये | जिनके घर पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं वे लोग प्राथमिक विद्यालयों में सर छिपाने को मजबूर हैं | 'टीम नियोविजन' ने ग्रामीणों के दुःख को बाँटने  की कोशिश की | साथ ही समाचार पत्रों के माध्यम से ये समस्याएँ सरकार तक भी पहुँचाने की कोशिश की गई | कोटमा, कविल्ठा और कालीमठ गावों तक 'टीम नियोविजन' पहुँची और ग्रामीणों को यह अहसास दिलाने की कोशिश की गई कि इस दुःख की घडी में पूरा देश आपके साथ है |


गाँव से वापस लौटते हुए 'टीम नियोविजन' ने बच्चों को कलम और कॉपियां भी दी, इसी उम्मीद के साथ कि ये बच्चे इस दुःख से उबरकर एक स्वर्णिम भविष्य की इबारत लिखेंगे और दुनिया को ऐसी विकट समस्याओं से उबरने में प्रेरणाश्रोत बनेंगे |

********************************************************************************

कुछ चित्र