'बस से सड़क पर उतरते हुए आज उसे जरा सा भी अपनापन महसूस नहीं हो रहा था | उसे लग रहा था जैसे गाँव से अब कोई नाता ही नहीं रहा | सब कुछ बदला नजर आ रहा था पर वह बेजुबान पैराफीड अपनी जगह पर अटल मौन पहले की तरह लेटा जैसे उसे देख रहा था | थोड़ी देर उस पर बैठकर उसने थकान उतारी, फिर अनमने ढंग से पगडण्डी की ओर कदम बढ़ा दिए | गाँव में पहुँचने पर उसे पूरी तरह सन्नाटा व्याप्त नजर आया | बस तीन ही परिवार में उसे बड़े-बूढ़े दिखाई दिए जो उसे आश्चर्य से देख रहे थे | दूर-दूर तक उसने गाँवों के घरों पर नजर दौड़ाई, अधिकतर घरों में ताले लटके हुए दिखाई पड़े | उसके चारपाई पर बैठते ही सब उसके पास ही बैठ गए थे | बहुत देर तक कोई कुछ कह नहीं पाया था | पड़ोसी बुजुर्ग भरत सिंह ने उसे उसके घर की चाबी सौंपते कहा "परछी हम कुछ लोगुन मिलिक दाह संस्कार कर याली थौ | अब अपणा घर की चाबी सम्भाल, हम लोगू कि जिंदगी कु अब कुई भरोसा नि छ | मैं त यूँ सभी से बोल रयों अब तुम लोग भी कखि और जाण कि सोचा | अब सभी गौं छोड़िक चलि गयेन त ई अकेला कनै रै पाला |" (परसों हम कुछ लोगों ने मिलकर दाह संस्कार कर दिया था अब अपने घर की चाबी सम्भालो, हम लोगों की जिंदगी का अब कोई भरोसा नहीं | मैं तो इन सबसे कह रहा हूँ कि अब तुम सब भी कहीं और जाने की सोचो जब सभी गाँव छोड़कर चले गये हैं तो ये अकेले कैसे रह पाएंगे |) कहते हुए उनकी आँखों में गाँव के उजड़ने का दर्द साफ़ झलक रहा था |
यह एक छोटा सा पैराग्राफ़ पहाड़ का दर्द बयान करने के लिए काफी है | अपने इस दर्द के अनुभव को शब्दों के माध्यम से कहानी की शक्ल देते हुए कहानीकार श्री हेमचन्द्र सकलानी अतीत की खुशनुमा यादों में चले जाते हैं | 'जड़' कहानी एक ऐसे ही परदेसी हो चुके व्यक्ति की दास्ताँ है जो कई साल बाद अपने गाँव लौटता है | उसे याद आता है तीस बरस पहले का वो दिन जब उसकी नौकरी लगी थी और माँ और बाजी उसे छोड़ने आये थे | वो हरा-भरा गाँव छोड़कर लखनऊ आ गया था और आज गाँव में सन्नाटा पसर गया है | मकान उजड़ गये हैं | गाँवों से पलायन की पृष्ठभूमि पर लिखी यह कहानी एक हकीकत का मार्मिक शब्द रूप है |
इसी प्रकार कहानी 'आम का पेड़' में रमाकांत के पर्यावरण प्रेम को चित्रित किया गया है | पेड़ पर दौड़ती-कूदती गिलहरियों का जिक्र है तथा ये भी बताया गया है कि कैसे आम का पेड़ उनके घर की पहचान बन जाता है क्योंकि आस-पास कोई भी अन्य फलदार पेड़ नहीं है | "जब कभी परिवार सहित सभी, घर से अकेला छोड़कर शादी-ब्याह, पारिवारिक, सामाजिक कार्यों में जाते और कोई पूछता, घर में कौन है, अकेला छोड़कर आये हो ? रमाकांत बड़ी सहजता से उत्तर देता था, नहीं आम का पेड़ है, घर अकेला नहीं है |"
हेमचन्द्र सकलानी जी के ताजातरीन कहानी-संग्रह 'अन्तर्मन की अनुभूतियाँ' में तेरह बढ़िया कहानियां संग्रहित हैं | इन कहानियों में रोजमर्रा की जिंदगी में घटने वाली घटनाएं हैं जिनसे हम सभी जुड़े हुए हैं | 'लौट आओ गौरैया' में शहरी जीवन से लुप्त हो चुकी गौरैया के बहाने पर्यावरण के प्रति उदासीनता दर्शायी गयी है तो वहीँ 'कमीनी चीज' कहानी में धन की अनन्त लिप्सा को दो दोस्तों की कहानी से बताया गया है |
इन सभी कहानियों के बीच कथाकार के जीवन से जुडी विशिष्ट घटनाओं का जिक्र करती कहानी मुझे बेहद पसंद आई | जहाँ आपके साधनविहीन बचपन, खेल के प्रति विशेष लगाव व प्रारंभिक नौकरी की चर्चा मर्मस्पर्शी है | कविवर सोहन लाल द्विवेदी जी से आपकी प्रथम मुलाकात, उनका वात्सल्य और प्रेरणा कहानी को यादगार बना देते हैं |
प्रत्येक कहानी से गुजरते हुए एक अपनापे का गहरा आभास होता है | लगता है मेरी ही कहानी रची गयी है | वही जाने-पहचाने गाँव, लोग, भाषा; वही भोगा, देखा हुआ दुःख, पीड़ा और वही उलझा हुआ जीवन | शुष्क पड़ चुकी ज़िन्दगी की रेत को भिगोने का न सिर्फ प्रयास करती बल्कि तर-ब-तर करती कहानियाँ |
सकलानी जी न सिर्फ अच्छे यात्रा-वृतांत लेखक, पुरस्कृत कवि हैं बल्कि एक सम्मानित कहानीकार भी हैं | मैं ऐसे गुणी लेखक, छल-कपट रहित व्यक्ति और सौम्य व शालीन अग्रज से मिलकर खुद को धन्य महसूस करता हूँ |
यह एक छोटा सा पैराग्राफ़ पहाड़ का दर्द बयान करने के लिए काफी है | अपने इस दर्द के अनुभव को शब्दों के माध्यम से कहानी की शक्ल देते हुए कहानीकार श्री हेमचन्द्र सकलानी अतीत की खुशनुमा यादों में चले जाते हैं | 'जड़' कहानी एक ऐसे ही परदेसी हो चुके व्यक्ति की दास्ताँ है जो कई साल बाद अपने गाँव लौटता है | उसे याद आता है तीस बरस पहले का वो दिन जब उसकी नौकरी लगी थी और माँ और बाजी उसे छोड़ने आये थे | वो हरा-भरा गाँव छोड़कर लखनऊ आ गया था और आज गाँव में सन्नाटा पसर गया है | मकान उजड़ गये हैं | गाँवों से पलायन की पृष्ठभूमि पर लिखी यह कहानी एक हकीकत का मार्मिक शब्द रूप है |
इसी प्रकार कहानी 'आम का पेड़' में रमाकांत के पर्यावरण प्रेम को चित्रित किया गया है | पेड़ पर दौड़ती-कूदती गिलहरियों का जिक्र है तथा ये भी बताया गया है कि कैसे आम का पेड़ उनके घर की पहचान बन जाता है क्योंकि आस-पास कोई भी अन्य फलदार पेड़ नहीं है | "जब कभी परिवार सहित सभी, घर से अकेला छोड़कर शादी-ब्याह, पारिवारिक, सामाजिक कार्यों में जाते और कोई पूछता, घर में कौन है, अकेला छोड़कर आये हो ? रमाकांत बड़ी सहजता से उत्तर देता था, नहीं आम का पेड़ है, घर अकेला नहीं है |"
हेमचन्द्र सकलानी जी के ताजातरीन कहानी-संग्रह 'अन्तर्मन की अनुभूतियाँ' में तेरह बढ़िया कहानियां संग्रहित हैं | इन कहानियों में रोजमर्रा की जिंदगी में घटने वाली घटनाएं हैं जिनसे हम सभी जुड़े हुए हैं | 'लौट आओ गौरैया' में शहरी जीवन से लुप्त हो चुकी गौरैया के बहाने पर्यावरण के प्रति उदासीनता दर्शायी गयी है तो वहीँ 'कमीनी चीज' कहानी में धन की अनन्त लिप्सा को दो दोस्तों की कहानी से बताया गया है |
इन सभी कहानियों के बीच कथाकार के जीवन से जुडी विशिष्ट घटनाओं का जिक्र करती कहानी मुझे बेहद पसंद आई | जहाँ आपके साधनविहीन बचपन, खेल के प्रति विशेष लगाव व प्रारंभिक नौकरी की चर्चा मर्मस्पर्शी है | कविवर सोहन लाल द्विवेदी जी से आपकी प्रथम मुलाकात, उनका वात्सल्य और प्रेरणा कहानी को यादगार बना देते हैं |
प्रत्येक कहानी से गुजरते हुए एक अपनापे का गहरा आभास होता है | लगता है मेरी ही कहानी रची गयी है | वही जाने-पहचाने गाँव, लोग, भाषा; वही भोगा, देखा हुआ दुःख, पीड़ा और वही उलझा हुआ जीवन | शुष्क पड़ चुकी ज़िन्दगी की रेत को भिगोने का न सिर्फ प्रयास करती बल्कि तर-ब-तर करती कहानियाँ |
सकलानी जी न सिर्फ अच्छे यात्रा-वृतांत लेखक, पुरस्कृत कवि हैं बल्कि एक सम्मानित कहानीकार भी हैं | मैं ऐसे गुणी लेखक, छल-कपट रहित व्यक्ति और सौम्य व शालीन अग्रज से मिलकर खुद को धन्य महसूस करता हूँ |
