Friday, 11 October 2013

शुक्रिया सचिन !!!


हिन्दुस्तान के उन लाखों प्रशंसकों में मैं भी रहा हूँ जो सचिन की बल्लेबाजी के वक़्त बाजार में 'भीड़' लगा देते हैं | इलेक्ट्रोनिक्स की दुकान में रखे टीवी सेट पर जब मैच चलता है तो एक, दो, दस के बाद पचासों लोग खड़े हो जाते हैं और सड़कें जाम हो जाती हैं | कस्बों में कुछ भले दुकानकार होते हैं जो मैच के समय टीवी सेट का मुँह सड़क की ओर कर देते हैं और मेला लग जाता है | किसी तेज गेंदबाज पर जब सचिन स्ट्रेट-ड्राइव लगाते हैं या कलात्मक फ्लिक शॉट खेलते हैं तो तालियाँ, सीटी बजती हैं और ये सिलसिला चलता रहता है जब तक कि क्रिकेट का ये दबंग आउट नहीं हो जाता |

मगर अफ़सोस, अब ये नजारा देखने को नहीं मिलेगा | सड़कें जाम नहीं होंगी | वे लोग राहत की साँस लेंगे जिन्हें क्रिकेट फूटी आँख नहीं सुहाता | २२ गज पर २४ साल तक राज करने वाला १८ नवम्बर को आखिरी बार मैदान में उतरेगा तो क्रिकेट की पुस्तक का एक अद्भुत अध्याय समाप्त हो जाएगा |


सन ८८ - ८९ में पैदा हुए बच्चे अब नौजवान हैं और तब का १६ बरस का युवा अब मैदान को अलविदा कह रहा है | हजारों युवाओं का आदर्श बल्लेबाज, एक सादा लेकिन बेहतरीन इंसान अब मैदान पर मुल्क के लिए दौड़ता नहीं दिखाई देगा |  क्रिकेट का एक युग यहाँ खत्म होता है |

मैच जीतना अलग बात है और दिल जीतना अलग बात | सचिन ने दोनों काम किए | युवाओं से भरपूर 'मैन इन ब्लू' आगे बहुत से मैच जीतेगी लेकिन कितने दिल जीत पाती है, ये देखने योग्य होगा | सचिन सही मायने में क्रिकेट के एम्बेसेडर रहे |

"तुम्हारे जाने से भरी दुनिया में
कुछ खाली-खाली रहेगा,
शोर मचाता सन्नाटा
और चमकदार काली दुनिया
ये सब वक़्त-बेवक़्त तंग करेंगे मुझे
एक भय जो पिछले कुछ वर्षों से सता रहा था
वो आखिर हकीकत हुआ ;
उम्मीद ये कि
भर जाएगा ये घाव भी
तुम्हारे गुजरे दिनों की झलकियों से  |"



सचिन ने मुझे और मुझ जैसे कई प्रशंसकों को अनगिनत ख़ुशी के मौके दिए हैं |

इन सबके लिए --

शुक्रिया सचिन !!!

Friday, 27 September 2013

लंचबॉक्स - फ़िल्म समीक्षा !

             'लंच बॉक्स', लीक से हटकर बनी एक अनोखी फिल्म है | गिने-चुने किरदार, सीमित संवाद और किरदारों का बढ़िया निर्वहन |  फिल्म में दृश्यों की अनावश्यक खींचातानी से परहेज किया गया है | फिल्म के केंद्र में एक लंच-बॉक्स है और उसके दो सिरे जुड़े हैं रिटायर्मेंट के करीब पहुँच चुके एक सरकारी कर्मचारी और एक गृहणी से |  ये लंच-बॉक्स दोनों का पोस्ट-ऑफिस है जो मोबाइल के दौर में भी चिट्ठियाँ आदान-प्रदान करने के काम आता है |


    फिल्म शुरू होती है एक महिला 'ईला' (निम्रत कौर) के लंच-बॉक्स पैक करने से जो अपने विवाहित जीवन में पाक-कला के द्वारा रंग घोलना चाहती है |  फिर ये लंच-बॉक्स कई डिब्बेवालों के हाथों होते हुए अपने गंतव्य तक पहुँचता है | यह डिब्बा (लंच-बॉक्स), जो कि ईला ने तैयार किया था, 'श्री सावन फर्नान्डीज़' (इरफ़ान खान) के सामने रख दिया जाता है | फर्नान्डीज़ साहब अगले महीने सेवानिवृत्त होने वाले हैं | फर्नान्डीज़ लंच-बॉक्स खोलते हैं, खाना शुरू करते हैं और चट कर जाते हैं | डिब्बा बंद करके रख देते हैं | डिब्बेवाला डिब्बा घर पहुँचा देता है | ईला देखती है कि डिब्बा खाली होकर घर आया है तो फूली नहीं समाती और यह खुशखबरी देती है 'देशपांडे आंटी' को | देशपांडे आंटी फ़िल्म का अदृश्य किरदार हैं जो ईला से बात तो करती रहती हैं लेकिन पूरी फ़िल्म में नजर नहीं आती | शाम होते ही फर्नान्डीज़ घर पहुँचते हैं,  ईला दरवाजा खोलती है और दर्शक यहाँ पर पहली बार चौंक जाते हैं | ईला के पति के रूप में राजीव (नकुल वैद) घर पहुँचते हैं और फर्नान्डीज़ साहब अपने घर |

अपने पति के साथ बातचीत में ईला समझ जाती है कि डिब्बा उनके पति को नहीं बल्कि किसी और शख्स को  मिला है | इस राज़ से पर्दा उठाने के लिए अगले दिन वह फिर लंच-बॉक्स तैयार करती है और साथ में रखती है एक पत्र जिसमें कहती है कि "कल खाली डिब्बा भेजने के लिए शुक्रिया" |  यह सलाह देशपांडे  आंटी  की थी | जवाब में फर्नान्डीज़ लिखते हैं कि - "प्रिय ईला, आज खाने में नमक कुछ ज्यादा था" और यह सिलसिला चलता जाता है | ये पत्र प्रेम-पत्र नहीं हैं, सिर्फ़ एक-दूसरे से बातें साझा करने के माध्यम भर हैं | ये पत्र दो अजनबियों के बीच एक अनोखी दोस्ती का रिश्ता कायम करते है और तमाम सुख-दुःख व छोटी-छोटी बातें साझा होती हैं |

         फ़िल्म में तीसरा और महत्वपूर्ण किरदार है एक रंगरूट 'शेख' (नवाजुद्दीन सिद्धिकी) का जो कि फर्नान्डीज़ साहब से काम की ट्रेनिंग लेना चाहता है | फर्नान्डीज़ सर उसे टालते रहते हैं | फिर धीरे-धीरे शेख और मिस्टर फर्नान्डीज़ करीबी हो जाते हैं,  एक साथ लंच करते हैं, कभी-कभी लोकल ट्रेन में साथ घर जाते हैं |

तमाम पत्रों के बाद ईला और फर्नान्डीज़ मिलने का फैसला करते हैं लेकिन अपनी-अपनी उम्र और जिम्मेदारियों के चलते मिल नहीं पाते और न ही भूटान में शिफ्ट हो जाने के विचार को आगे ले जाते हैं | दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में एक-दूसरे की कमी महसूस करते हुए अकेले आगे बढ़ जाते हैं |

घर और ऑफिस के बीच घूमते लंच-बॉक्स की कहानी अच्छी है | फ़िल्म विषय से कभी भटकती नहीं है | 'रितेश बत्रा' ने एक लेखक और खास तौर से निर्देशक के रूप में बढ़िया काम किया है |

इरफ़ान खान एक बेहतरीन अभिनेता हैं और अपनी अन्य फिल्मों की तरह उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है |  नवाजुद्दीन भी एक बढ़िया कलाकार हैं | फ़िल्म में वे जब-जब स्क्रीन पर आते हैं, दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान खिल जाती है | इरफ़ान और नवाजुद्दीन की केमिस्ट्री लाजवाब है | निम्रत कौर एक घरुलू महिला के किरदार में औसत रही हैं |

इस फ़िल्म में शब्दों के संवाद कम और अभिनय के संवाद अधिक हैं | कुछ बेहतरीन डायलॉग्स हैं और पूरी फ़िल्म दर्शकों को हँसाती रहती है | व्यावसायिक हिंदी फिल्मों से इतर, लंच-बॉक्स में एक भी मौलिक गाना नहीं है | गानों की कोई जरुरत भी फिल्म में महसूस नहीं होती |

विश्व-स्तर पर पहले ही प्रशंसा बटोर चुकी यह फिल्म भारत की ओर से 'आस्कर' में भेजे जाने के लिए भी नामांकित हुई किन्तु गुजराती फिल्म 'दि गुड रोड' से पिछड़ गई | | यह फ़िल्म लम्बे समय तक दर्शकों के दिलों में रहेगी |

Wednesday, 25 September 2013

उत्तराखण्ड त्रासदी और निओविजन की मदद !

उत्तराखण्ड, हिमालय की गोद में बसा एक छोटा सा खूबसूरत प्रदेश | माँ गँगा और यमुना का मायका | एक देवस्थली जहाँ पर बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री और हेमकुंड साहिब जैसे पवित्र धाम स्थित हैं | इन धामों में प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु पहुँचकर शीश नवाते हैं |  ऋषिकेश और कुम्भनगरी हरिद्वार जैसे धार्मिक नगर आगंतुकों का खुले दिल से स्वागत करते हैं |

यही नहीं उत्तराखण्ड में मसूरी, औली, फूलों की घाटी, नैनीताल और कौसानी जैसे अनेकों पर्यटक स्थल हैं जहाँ देश-विदेश से हर वर्ष लाखों की संख्या में  पर्यटक घूमने-फिरने और छुट्टियाँ बिताने आते हैं |


हमेशा की तरह उत्तराखण्ड तमाम पर्यटकों और श्रद्धालुओं की आवाभगत में व्यस्त था कि अचानक किसी की नज़र लग गई | १६ जुलाई, २०१३ की शाम, जब केदारनाथ धाम में भोलेनाथ की पूजा-अर्चना चल रही थी, मंदिर की घंटियाँ बज रही थी, कुछ श्रद्धालु आरती में शामिल थे तो कुछ लोग होटल के कमरों में आराम कर रहे थे, बच्चे गलियों में इधर-उधर विचरण कर रहे थे कि तभी अचानक जोर की आवाज़ के साथ चट्टानों के बीच से एक विकराल नदी बहने लगी |  ये नदी अपने साथ बड़े-बड़े पत्थरों को बहाकर ला रही थी | इसका बहाव इतना तेज़ था कि किसी को सँभलने का भी समय नहीं मिला | केदार धाम में अफरा-तफरी मच गई | लोग बेतहाशा इधर-उधर दौड़ने लगे | देखते ही देखते ये विकराल जल धारा मंदिर तक पहुँच गई | लोग पानी में समाहित होने लगे | बच्चों के हाथ छूटने लगे और नदी का तीव्र प्रवाह उन्हें बहाकर ले जाने लगा | कुछ लोग जान बचाने के लिए आस-पास कि चट्टानों कि ओर दौड़े | जो लोग चट्टानों पर चढ़ गए, वे अपनी जान बचाने में सफल रहे, जो नहीं चढ़ पाए वे नदी की धारा के साथ बहते चले गए | परिवार के परिवार ख़त्म हो गये | बहुमंजिला भवन जमींदोज हो गए | पलभर में खूबसूरत केदारघाटी श्मसान हो गई | ये जल-प्रवाह केदारनाथ से नीचे स्थित रामबाड़ा और गौरीकुंड को भी काफी हद तक बहा ले गया | कुछ इसी प्रकार का भयावह दृश्य समूचे उत्तराखण्ड में नज़र आया |

गँगा, अलकनंदा, पिंडर, मन्दाकिनी और धौली, हर नदी अपने उफ़ान पर थी | समय के इस कुचक्र में हजारों जिंदगियां ख़त्म हो गयी | लाखों लोग जगह-जगह फँस गए जिन्हें सेना की लम्बी मशक्कत के बाद निकाला जा सका | यह बचाव कार्य कई दिनों तक अनवरत चलता रहा और इस विकट घडी में उत्तराखण्ड के ग्रामीणों ने यात्रियों की सेवा व मदद में कोई कसर नहीं छोड़ी | उनके घरों का राशन ख़त्म हो गया लेकिन यात्रियों को कष्ट न होने दिया |

सरकार द्वारा देश के अन्यत्र राज्यों के श्रद्धालुओं को सुरक्षित उनके घर तक पहुँचा दिया गया और काल में मुँह में शेष रह गए उत्तराखण्ड के ग्रामीण परिवार | वे परिवार जिन्होंने इस त्रासदी में अपने बेटों को खो दिया, वे परिवार जिनके सर से पिता का साया उठ गया, वे परिवार जिनके आय के स्थान ख़त्म हो गए, वे परिवार जहाँ सभी महिलाएँ विधवा हो गई, वे परिवार जिनके घर उजड़ गए और खेत-खलिहान नदी के उफ़ान द्वारा काट लिए गए |

वक्त गुजरा, सरकारी और गैर-सरकारी मदद ग्रामीणों तक पहुँचाई जाने लगी | इन सबके बावजूद कई गाँव और परिवार ऐसे रहे जहाँ सड़कें व पुल टूट जाने के कारण कोई मदद नहीं पहुँची | ऐसे ही गाँवों को ध्यान में रखकर उत्तराखण्ड की एक स्वयंसेवी संस्था 'नियोविजन फाउंडेशन' (Neo Vision Foundation), गजेन्द्र रमोला के नेतृत्व में सितम्बर,२०१३ को देहरादून से रुद्रप्रयाग जनपद के लिए रवाना हुई |

रुद्रप्रयाग ही वह जिला है जो इस जल-प्रलय में सबसे अधिक प्रभावित हुआ | वहाँ का दृश्य अभी भी दिल को कँपा  देता है | देहरादून से रुद्रप्रयाग के रास्ते में 'टीम नियोविजन' ने देखा कि सड़कें पूरी तरह टूटी हुई हैं | नदी किनारे स्थित घरों व दुकानों का नामोनिशान तक मिट चुका है | तमाम पुल बह चुके हैं | कई मकान टूटकर हवा में झूल रहे हैं | ऐसी परिस्थियों को पारकर 'टीम नियोविजन' कालीमठ पहुँची | वे परिवार जो अब तक किसी भी प्रकार की मदद से वंचित रह गए उन्हें चिन्हित किया गया | ये वे ग्रामीण परिवार हैं जहाँ सड़कें व पुल टूटी होने के कारण मदद के लिए कोई नहीं पहुँचा | 'टीम नियोविजन' २५-३० किलोमीटर का पैदल सफ़र तय कर इन गाँवों तक पहुँची | चिन्हित किये गए २५ परिवारों को चेक द्वारा आर्थिक मदद दी गयी और  ५० परिवारों को शॉल, चटाई, बर्तन, राशन के पैकेट और गर्म कपडे आदि वितरित किये गए |


गाँवों में लोग अपने टूटे हुए मकानों, खेत के पुस्तों की मरम्मत करते नज़र आये | जिनके घर पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं वे लोग प्राथमिक विद्यालयों में सर छिपाने को मजबूर हैं | 'टीम नियोविजन' ने ग्रामीणों के दुःख को बाँटने  की कोशिश की | साथ ही समाचार पत्रों के माध्यम से ये समस्याएँ सरकार तक भी पहुँचाने की कोशिश की गई | कोटमा, कविल्ठा और कालीमठ गावों तक 'टीम नियोविजन' पहुँची और ग्रामीणों को यह अहसास दिलाने की कोशिश की गई कि इस दुःख की घडी में पूरा देश आपके साथ है |


गाँव से वापस लौटते हुए 'टीम नियोविजन' ने बच्चों को कलम और कॉपियां भी दी, इसी उम्मीद के साथ कि ये बच्चे इस दुःख से उबरकर एक स्वर्णिम भविष्य की इबारत लिखेंगे और दुनिया को ऐसी विकट समस्याओं से उबरने में प्रेरणाश्रोत बनेंगे |

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कुछ चित्र  






















Friday, 9 August 2013

ऐ मेरे वतन के लोगों

ऐ मेरे वतन के लोगों, तुम खूब लगा लो नारा
ये शुभ दिन है हम सब का, लहरा लो तिरंगा प्यारा
पर मत भूलो सीमा पर, वीरों ने है प्राण गंवाए
कुछ याद उन्हें भी कर लो, कुछ याद उन्हें भी कर लो
जो लौट के घर न आए, जो लौट के घर न आए...
ऐ मेरे वतन के लोगो, ज़रा आंख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुरबानी
ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुरबानी
तुम भूल न जाओ उनको, इसलिए सुनो ये कहानी
जो शहीद हुए हैं, उनकी, जरा याद करो कुरबानी...
जब घायल हुआ हिमालय, ख़तरे में पड़ी आज़ादी
जब तक थी सांस लड़े वो... जब तक थी सांस लड़े वो, फिर अपनी लाश बिछा दी
संगीन पे धर कर माथा, सो गए अमर बलिदानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुरबानी...
जब देश में थी दीवाली, वो खेल रहे थे होली
जब हम बैठे थे घरों में... जब हम बैठे थे घरों में, वो झेल रहे थे गोली
थे धन्य जवान वो अपने, थी धन्य वो उनकी जवानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुरबानी...
कोई सिख कोई जाट मराठा, कोई सिख कोई जाट मराठा,
कोई गुरखा कोई मदरासी, कोई गुरखा कोई मदरासी
सरहद पर मरनेवाला... सरहद पर मरनेवाला, हर वीर था भारतवासी
जो खून गिरा पर्वत पर, वो खून था हिंदुस्तानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुरबानी...
थी खून से लथ - पथ काया, फिर भी बंदूक उठाके
दस - दस को एक ने मारा, फिर गिर गए होश गंवा के
जब अंत समय आया तो.... जब अंत-समय आया तो, कह गए के अब मरते हैं
खुश रहना देश के प्यारो... खुश रहना देश के प्यारो
अब हम तो सफ़र करते हैं... अब हम तो सफ़र करते हैं
क्या लोग थे वो दीवाने, क्या लोग थे वो अभिमानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुरबानी
तुम भूल न जाओ उनको, इसलिए कही ये कहानी
जो शहीद हुए हैं, उनकी जरा याद करो कुरबानी
जय हिंद, जय हिंद, जय हिंद की सेना... जय हिंद, जय हिंद, जय हिंद की सेना..
जय हिंद, जय हिंद जय हिंद, जय हिंद जय हिंद, जय हिंद...     --  कवि प्रदीप 
 

Sunday, 16 June 2013

उत्तराखंड में एक बार फिर त्रासदी ! दुखद !!!

हे भगवान् !!! ये क्या हो रहा है मेरे घर में.....
पिछले साल की त्रासदी के जख्म अभी हरे हैं और फिर से ये मुसीबत...
सबकी रक्षा करना ईश्वर |


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वर्षों की मेहनत और यादें ध्वस्त हो गयी
शिव मंदिर हुआ जल में समाहित
भोलेनाथ गंगा-स्नान करते हुए 
गाड़ी बही 
कर्णप्रयाग में उफनती नदी  
गोविन्दघाट में बाढ़ का प्रकोप  


















तबाही के बाद केदारनाथ की तस्वीर ! मंदिर के अतिरिक्त सब कुछ बह गया।  वे लोग कहाँ गये जो यहाँ रह रहे थे ??















रुद्रप्रयाग में नदी के स्तर का अन्तर - पहले और अब













भोलेनाथ - पहले और अब


Thursday, 6 June 2013

अद्भुत प्रतिभा -- प्रेरणा !!!

मैंने अपनी जिन्दगी में ऐसी प्रतिभा नहीं देखी। एक १२ साल की बच्ची 'प्रेरणा' जो जन्मान्ध है वो न सिर्फ बेहतरीन गाती है बल्कि किसी भी गीत का सरगम बता सकती है वो भी बिना किसी संगीत की शिक्षा लिए। साथ ही गिटार, की-बोर्ड और कई वाद्य-यंत्र बजा सकती है। और जिस बात ने मुझे हैरत में डाल दिया वो ये कि यदि कोई मोबाइल पर कोई भी बटन दबा दे तो वो आवाज सुनकर बता सकती है कि कौन सा बटन दबा। तीनों निर्णायकों ने तो उसे साक्षात माँ सरस्वती बताया। भगवान् करे ये सब सच हो । आगे के सफ़र के प्रति उत्सुकता रहेगी । बेहतरीन Indian Idol Junior !!!

न जाने क्यों मेरी आखों में बादल छा गये थे तब
वो बच्ची जब तबस्सुम लेके महफ़िल में चली आई !!
You Tube Link - यहाँ देखें !!!