'लंच बॉक्स', लीक से हटकर बनी एक अनोखी फिल्म है | गिने-चुने किरदार, सीमित संवाद और किरदारों का बढ़िया निर्वहन | फिल्म में दृश्यों की अनावश्यक खींचातानी से परहेज किया गया है | फिल्म के केंद्र में एक लंच-बॉक्स है और उसके दो सिरे जुड़े हैं रिटायर्मेंट के करीब पहुँच चुके एक सरकारी कर्मचारी और एक गृहणी से | ये लंच-बॉक्स दोनों का पोस्ट-ऑफिस है जो मोबाइल के दौर में भी चिट्ठियाँ आदान-प्रदान करने के काम आता है |
फिल्म शुरू होती है एक महिला 'ईला' (निम्रत कौर) के लंच-बॉक्स पैक करने से जो अपने विवाहित जीवन में पाक-कला के द्वारा रंग घोलना चाहती है | फिर ये लंच-बॉक्स कई डिब्बेवालों के हाथों होते हुए अपने गंतव्य तक पहुँचता है | यह डिब्बा (लंच-बॉक्स), जो कि ईला ने तैयार किया था, 'श्री सावन फर्नान्डीज़' (इरफ़ान खान) के सामने रख दिया जाता है | फर्नान्डीज़ साहब अगले महीने सेवानिवृत्त होने वाले हैं | फर्नान्डीज़ लंच-बॉक्स खोलते हैं, खाना शुरू करते हैं और चट कर जाते हैं | डिब्बा बंद करके रख देते हैं | डिब्बेवाला डिब्बा घर पहुँचा देता है | ईला देखती है कि डिब्बा खाली होकर घर आया है तो फूली नहीं समाती और यह खुशखबरी देती है 'देशपांडे आंटी' को | देशपांडे आंटी फ़िल्म का अदृश्य किरदार हैं जो ईला से बात तो करती रहती हैं लेकिन पूरी फ़िल्म में नजर नहीं आती | शाम होते ही फर्नान्डीज़ घर पहुँचते हैं, ईला दरवाजा खोलती है और दर्शक यहाँ पर पहली बार चौंक जाते हैं | ईला के पति के रूप में राजीव (नकुल वैद) घर पहुँचते हैं और फर्नान्डीज़ साहब अपने घर |
अपने पति के साथ बातचीत में ईला समझ जाती है कि डिब्बा उनके पति को नहीं बल्कि किसी और शख्स को मिला है | इस राज़ से पर्दा उठाने के लिए अगले दिन वह फिर लंच-बॉक्स तैयार करती है और साथ में रखती है एक पत्र जिसमें कहती है कि "कल खाली डिब्बा भेजने के लिए शुक्रिया" | यह सलाह देशपांडे आंटी की थी | जवाब में फर्नान्डीज़ लिखते हैं कि - "प्रिय ईला, आज खाने में नमक कुछ ज्यादा था" और यह सिलसिला चलता जाता है | ये पत्र प्रेम-पत्र नहीं हैं, सिर्फ़ एक-दूसरे से बातें साझा करने के माध्यम भर हैं | ये पत्र दो अजनबियों के बीच एक अनोखी दोस्ती का रिश्ता कायम करते है और तमाम सुख-दुःख व छोटी-छोटी बातें साझा होती हैं |
फ़िल्म में तीसरा और महत्वपूर्ण किरदार है एक रंगरूट 'शेख' (नवाजुद्दीन सिद्धिकी) का जो कि फर्नान्डीज़ साहब से काम की ट्रेनिंग लेना चाहता है | फर्नान्डीज़ सर उसे टालते रहते हैं | फिर धीरे-धीरे शेख और मिस्टर फर्नान्डीज़ करीबी हो जाते हैं, एक साथ लंच करते हैं, कभी-कभी लोकल ट्रेन में साथ घर जाते हैं |
तमाम पत्रों के बाद ईला और फर्नान्डीज़ मिलने का फैसला करते हैं लेकिन अपनी-अपनी उम्र और जिम्मेदारियों के चलते मिल नहीं पाते और न ही भूटान में शिफ्ट हो जाने के विचार को आगे ले जाते हैं | दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में एक-दूसरे की कमी महसूस करते हुए अकेले आगे बढ़ जाते हैं |
घर और ऑफिस के बीच घूमते लंच-बॉक्स की कहानी अच्छी है | फ़िल्म विषय से कभी भटकती नहीं है | 'रितेश बत्रा' ने एक लेखक और खास तौर से निर्देशक के रूप में बढ़िया काम किया है |
इरफ़ान खान एक बेहतरीन अभिनेता हैं और अपनी अन्य फिल्मों की तरह उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है | नवाजुद्दीन भी एक बढ़िया कलाकार हैं | फ़िल्म में वे जब-जब स्क्रीन पर आते हैं, दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान खिल जाती है | इरफ़ान और नवाजुद्दीन की केमिस्ट्री लाजवाब है | निम्रत कौर एक घरुलू महिला के किरदार में औसत रही हैं |
इस फ़िल्म में शब्दों के संवाद कम और अभिनय के संवाद अधिक हैं | कुछ बेहतरीन डायलॉग्स हैं और पूरी फ़िल्म दर्शकों को हँसाती रहती है | व्यावसायिक हिंदी फिल्मों से इतर, लंच-बॉक्स में एक भी मौलिक गाना नहीं है | गानों की कोई जरुरत भी फिल्म में महसूस नहीं होती |
विश्व-स्तर पर पहले ही प्रशंसा बटोर चुकी यह फिल्म भारत की ओर से 'आस्कर' में भेजे जाने के लिए भी नामांकित हुई किन्तु गुजराती फिल्म 'दि गुड रोड' से पिछड़ गई | | यह फ़िल्म लम्बे समय तक दर्शकों के दिलों में रहेगी |
फिल्म शुरू होती है एक महिला 'ईला' (निम्रत कौर) के लंच-बॉक्स पैक करने से जो अपने विवाहित जीवन में पाक-कला के द्वारा रंग घोलना चाहती है | फिर ये लंच-बॉक्स कई डिब्बेवालों के हाथों होते हुए अपने गंतव्य तक पहुँचता है | यह डिब्बा (लंच-बॉक्स), जो कि ईला ने तैयार किया था, 'श्री सावन फर्नान्डीज़' (इरफ़ान खान) के सामने रख दिया जाता है | फर्नान्डीज़ साहब अगले महीने सेवानिवृत्त होने वाले हैं | फर्नान्डीज़ लंच-बॉक्स खोलते हैं, खाना शुरू करते हैं और चट कर जाते हैं | डिब्बा बंद करके रख देते हैं | डिब्बेवाला डिब्बा घर पहुँचा देता है | ईला देखती है कि डिब्बा खाली होकर घर आया है तो फूली नहीं समाती और यह खुशखबरी देती है 'देशपांडे आंटी' को | देशपांडे आंटी फ़िल्म का अदृश्य किरदार हैं जो ईला से बात तो करती रहती हैं लेकिन पूरी फ़िल्म में नजर नहीं आती | शाम होते ही फर्नान्डीज़ घर पहुँचते हैं, ईला दरवाजा खोलती है और दर्शक यहाँ पर पहली बार चौंक जाते हैं | ईला के पति के रूप में राजीव (नकुल वैद) घर पहुँचते हैं और फर्नान्डीज़ साहब अपने घर |अपने पति के साथ बातचीत में ईला समझ जाती है कि डिब्बा उनके पति को नहीं बल्कि किसी और शख्स को मिला है | इस राज़ से पर्दा उठाने के लिए अगले दिन वह फिर लंच-बॉक्स तैयार करती है और साथ में रखती है एक पत्र जिसमें कहती है कि "कल खाली डिब्बा भेजने के लिए शुक्रिया" | यह सलाह देशपांडे आंटी की थी | जवाब में फर्नान्डीज़ लिखते हैं कि - "प्रिय ईला, आज खाने में नमक कुछ ज्यादा था" और यह सिलसिला चलता जाता है | ये पत्र प्रेम-पत्र नहीं हैं, सिर्फ़ एक-दूसरे से बातें साझा करने के माध्यम भर हैं | ये पत्र दो अजनबियों के बीच एक अनोखी दोस्ती का रिश्ता कायम करते है और तमाम सुख-दुःख व छोटी-छोटी बातें साझा होती हैं |
फ़िल्म में तीसरा और महत्वपूर्ण किरदार है एक रंगरूट 'शेख' (नवाजुद्दीन सिद्धिकी) का जो कि फर्नान्डीज़ साहब से काम की ट्रेनिंग लेना चाहता है | फर्नान्डीज़ सर उसे टालते रहते हैं | फिर धीरे-धीरे शेख और मिस्टर फर्नान्डीज़ करीबी हो जाते हैं, एक साथ लंच करते हैं, कभी-कभी लोकल ट्रेन में साथ घर जाते हैं |तमाम पत्रों के बाद ईला और फर्नान्डीज़ मिलने का फैसला करते हैं लेकिन अपनी-अपनी उम्र और जिम्मेदारियों के चलते मिल नहीं पाते और न ही भूटान में शिफ्ट हो जाने के विचार को आगे ले जाते हैं | दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में एक-दूसरे की कमी महसूस करते हुए अकेले आगे बढ़ जाते हैं |
घर और ऑफिस के बीच घूमते लंच-बॉक्स की कहानी अच्छी है | फ़िल्म विषय से कभी भटकती नहीं है | 'रितेश बत्रा' ने एक लेखक और खास तौर से निर्देशक के रूप में बढ़िया काम किया है |
इरफ़ान खान एक बेहतरीन अभिनेता हैं और अपनी अन्य फिल्मों की तरह उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है | नवाजुद्दीन भी एक बढ़िया कलाकार हैं | फ़िल्म में वे जब-जब स्क्रीन पर आते हैं, दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान खिल जाती है | इरफ़ान और नवाजुद्दीन की केमिस्ट्री लाजवाब है | निम्रत कौर एक घरुलू महिला के किरदार में औसत रही हैं |
इस फ़िल्म में शब्दों के संवाद कम और अभिनय के संवाद अधिक हैं | कुछ बेहतरीन डायलॉग्स हैं और पूरी फ़िल्म दर्शकों को हँसाती रहती है | व्यावसायिक हिंदी फिल्मों से इतर, लंच-बॉक्स में एक भी मौलिक गाना नहीं है | गानों की कोई जरुरत भी फिल्म में महसूस नहीं होती |
विश्व-स्तर पर पहले ही प्रशंसा बटोर चुकी यह फिल्म भारत की ओर से 'आस्कर' में भेजे जाने के लिए भी नामांकित हुई किन्तु गुजराती फिल्म 'दि गुड रोड' से पिछड़ गई | | यह फ़िल्म लम्बे समय तक दर्शकों के दिलों में रहेगी |

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