Thursday, 23 January 2014

गणतंत्र दिवस नए परिंदों के साथ !

शिक्षा का अधिकार यानि Right to Education Act (RTE), जो सुनिश्चित करता है 6 से 14 बरस के बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21-A इन मासूमों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के महत्व के तौर तरीकों की व्याख्या करता है | लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई में सभी बच्चे इस अधिकार से लाभान्वित हो रहे हैं ? और जवाब है - बिलकुल नहीं |

ये कागजी अधिकार सिर्फ तकदीर (और पैसे) वालों को ही नसीब हो रहे हैं | जिन्हें स्कूल जाने का सौभाग्य नहीं मिला वे अपनी किस्मत को कोसते हैं और इस प्रकार इन बच्चों की पाठशालाओं के प्रति विमुखता मुखर होती है | पढाई के प्रति ये बच्चे अपना नैसर्गिक प्रेम खो चुके हैं |

गणतंत्र दिवस पर एक छोटी सी कोशिश के तहत 'नियो विजन फाउंडेशन' इन बच्चों से जुड़कर फिर से उस चिराग को रोशन करना चाहता है जो समय की आँधी से बुझ चुका है | मलिन बस्तियों (Slum Areas) में रह रहे बच्चों के साथ |  क्या पता इन्हीं में हों कल के भगत, सुभाष, टैगोर, कबीर, सचिन, लता, मिल्खा और कलाम |

हम निकले हैं २६ जनवरी के छुट्टी के दिन को यादगार बनाने के लिए |  आप भी आइये, जुड़िये |

लेकर फिर बस्ता, पाटी, पुस्तक
कॉपी, पेन्सिल, टिफिन |
निकलें हम भी होंठों पर रख
सीटी की सरगम |
मिला कदम से कदम
स्कूल चलें हम ||




Monday, 6 January 2014

कवि वीरप्रकाश जी का सम्मान समारोह


सौ से अधिक साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों की गरिमामयी उपस्थिति में आज शहर के वरिष्ठ कवि वीरप्रकाश लाहोटी 'सावन' जी को उनके ४ दशक लम्बे साहित्यिक योगदान के लिए २५ से अधिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया | ग़ज़ल-गायक ख़ान अख्तर ख़ान ने सम्मानित कवि के गीत-गजलों को गाकर कार्यक्रम की शुरुआत की | 



इस सुअवसर पर एक काव्य गोष्ठी भी आयोजित की गयी जिसमें श्री वीरप्रकाश लाहोटी, डॉ. ऋषभदेव शर्मा, श्री लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, श्रीमती विनीता शर्मा, श्री वेणुगोपाल भट्टड़, श्रीमती ज्योति नारायण, श्री अजीत गुप्ता, श्रीमती दीपशिखा पाठक, आशीष नैथानी सलिल तथा अन्य कवियों ने काव्य-पाठ किया |



यह गोष्ठी 'साँझ के साथी' साहित्यिक संस्था द्वारा श्री कृष्ण देवराय भवन, सुल्तान बाज़ार, हैदराबाद में आयोजित की गई |


कवि सावन जी का एक प्रसिद्ध गीत 


होंठ हैं सिले-सिले...

होंठ हैं सिले-सिले, जुबान बंद-बंद है 
उनकी यह खामोशियाँ, हमें नहीं पसंद है |

अनकहे कहे ही कह गये नयन, उनकी बात को
सो नहीं सकी हैं वो, पिछले सारी रात को |
किस बात का मचा हुआ, ह्रदय में उनके द्वन्द है
होंठ हैं सिले-सिले, जुबान बंद-बंद है  ||

मुँह से कुछ न बोलती, गीत गाती लग रही
अपने सारे जिस्म से, गुनगुनाती लग रही |
समझ नहीं सका हूँ मैं, कौन सा यह छंद है ?
होंठ हैं सिले-सिले, जुबान बंद-बंद है  ||

छिटक रही है चाँदनी, चमेली बेल के तले
बहे जा रहे यमुन में, दीप कुछ जले-जले |
आँचल किसी का ना उड़े, हवा भी मंद-मंद है
होंठ हैं सिले-सिले, जुबान बंद-बंद है ||

तरस रहा है ह्रदय मेरा, साथ उनका पाने को
बहक रहे कदम मेरे, पास उनके जाने को |
न जाने उनके जिस्म से महकती कौन गंध है 
होंठ हैं सिले-सिले, जुबान बंद-बंद है  ||

-- सावन 

क्लब ६० - फ़िल्म समीक्षा


         'क्लब ६०' हकीकत बयाँ करती कहानी है | ये कहानी है डॉ. तारीक शेख की, उनके परिवार की, उनके अकेलेपन की  | डॉ. दम्पति अपने युवा बेटे की अकाल मृत्यु से टूट जाते हैं, बिलकुल अकेले हो जाते हैं, जीने की सम्भावना से बहुत दूर | डॉ. शेख ख़ुदकुशी की भी कोशिश करते हैं लेकिन ज़िन्दगी उन्हें यहाँ भी मायूस कर देती है | शेख साहब की बेग़म डॉ. शायरा इस बुरे वक़्त में मजबूती से खड़ी रहती हैं और डॉ. शेख को भी वक़्त से लड़ने के लिए तैयार करती हैं |



          मुम्बई से पूना शिफ्ट होने पर युगल की मुलाकात एक अजब-गजब ६२ वर्षीय युवा मन्नू भाई शाह से होती है और यही है कहानी का विचित्र मगर मुख्य चरित्र | उल्टी टोपी, काला चश्मा, टी-शर्ट, हैंड-बैंड, कानों में एअर पीस, कंधे पर लटकता टेनिस बैट, बिलकुल २०-२२ बरस के लड़के का रूप धरे क्लब-६० का मैम्बर | डॉ. शेख इस खिलंदड़ किस्म के सख्स को पसंद नहीं करते और अपनी पत्नी को भी इससे दूर रहने की सलाह देते हैं लेकिन मन्नू भाई हैं कि मानते ही नहीं, घर में घुसे चले आते हैं, पराठे खाते हैं और तो और डॉ. शेख को भी क्लब-६० का सदस्य बना लेते हैं | डॉ. शायरा को मन्नू भाई का मिज़ाज़ पसंद आता है और डॉ. शेख क्लब-६० से जुड़ जाते हैं |



क्लब-६० में मुलाकात होती है मनसुखानी, जफ़र से......



जारी है ...