सौ से अधिक साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों की गरिमामयी उपस्थिति में आज शहर के वरिष्ठ कवि वीरप्रकाश लाहोटी 'सावन' जी को उनके ४ दशक लम्बे साहित्यिक योगदान के लिए २५ से अधिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया | ग़ज़ल-गायक ख़ान अख्तर ख़ान ने सम्मानित कवि के गीत-गजलों को गाकर कार्यक्रम की शुरुआत की |
इस सुअवसर पर एक काव्य गोष्ठी भी आयोजित की गयी जिसमें श्री वीरप्रकाश लाहोटी, डॉ. ऋषभदेव शर्मा, श्री लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, श्रीमती विनीता शर्मा, श्री वेणुगोपाल भट्टड़, श्रीमती ज्योति नारायण, श्री अजीत गुप्ता, श्रीमती दीपशिखा पाठक, आशीष नैथानी सलिल तथा अन्य कवियों ने काव्य-पाठ किया |
यह गोष्ठी 'साँझ के साथी' साहित्यिक संस्था द्वारा श्री कृष्ण देवराय भवन, सुल्तान बाज़ार, हैदराबाद में आयोजित की गई |
कवि सावन जी का एक प्रसिद्ध गीत
होंठ हैं सिले-सिले...
होंठ हैं सिले-सिले, जुबान बंद-बंद है
उनकी यह खामोशियाँ, हमें नहीं पसंद है |
अनकहे कहे ही कह गये नयन, उनकी बात को
सो नहीं सकी हैं वो, पिछले सारी रात को |
किस बात का मचा हुआ, ह्रदय में उनके द्वन्द है
होंठ हैं सिले-सिले, जुबान बंद-बंद है ||
मुँह से कुछ न बोलती, गीत गाती लग रही
अपने सारे जिस्म से, गुनगुनाती लग रही |
समझ नहीं सका हूँ मैं, कौन सा यह छंद है ?
होंठ हैं सिले-सिले, जुबान बंद-बंद है ||
छिटक रही है चाँदनी, चमेली बेल के तले
बहे जा रहे यमुन में, दीप कुछ जले-जले |
आँचल किसी का ना उड़े, हवा भी मंद-मंद है
होंठ हैं सिले-सिले, जुबान बंद-बंद है ||
तरस रहा है ह्रदय मेरा, साथ उनका पाने को
बहक रहे कदम मेरे, पास उनके जाने को |
न जाने उनके जिस्म से महकती कौन गंध है
होंठ हैं सिले-सिले, जुबान बंद-बंद है ||
-- सावन
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