Monday, 6 January 2014

क्लब ६० - फ़िल्म समीक्षा


         'क्लब ६०' हकीकत बयाँ करती कहानी है | ये कहानी है डॉ. तारीक शेख की, उनके परिवार की, उनके अकेलेपन की  | डॉ. दम्पति अपने युवा बेटे की अकाल मृत्यु से टूट जाते हैं, बिलकुल अकेले हो जाते हैं, जीने की सम्भावना से बहुत दूर | डॉ. शेख ख़ुदकुशी की भी कोशिश करते हैं लेकिन ज़िन्दगी उन्हें यहाँ भी मायूस कर देती है | शेख साहब की बेग़म डॉ. शायरा इस बुरे वक़्त में मजबूती से खड़ी रहती हैं और डॉ. शेख को भी वक़्त से लड़ने के लिए तैयार करती हैं |



          मुम्बई से पूना शिफ्ट होने पर युगल की मुलाकात एक अजब-गजब ६२ वर्षीय युवा मन्नू भाई शाह से होती है और यही है कहानी का विचित्र मगर मुख्य चरित्र | उल्टी टोपी, काला चश्मा, टी-शर्ट, हैंड-बैंड, कानों में एअर पीस, कंधे पर लटकता टेनिस बैट, बिलकुल २०-२२ बरस के लड़के का रूप धरे क्लब-६० का मैम्बर | डॉ. शेख इस खिलंदड़ किस्म के सख्स को पसंद नहीं करते और अपनी पत्नी को भी इससे दूर रहने की सलाह देते हैं लेकिन मन्नू भाई हैं कि मानते ही नहीं, घर में घुसे चले आते हैं, पराठे खाते हैं और तो और डॉ. शेख को भी क्लब-६० का सदस्य बना लेते हैं | डॉ. शायरा को मन्नू भाई का मिज़ाज़ पसंद आता है और डॉ. शेख क्लब-६० से जुड़ जाते हैं |



क्लब-६० में मुलाकात होती है मनसुखानी, जफ़र से......



जारी है ...

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