Saturday, 3 May 2014

नरेन्द्र सिंह नेगी और उनका गीत-संसार # 3

मेरा औंण से हर्ष हो कैत ह्व़े ल्यो
न हो मेरा जाणा कु दुख कै न हो ||

मेरा सुख मा हैंसणों, न्यूतू सबू कु
मेरा दुख मा रूणा कु हक़ कै न हो ||

मुलुक हो परायू, खुद हो तुमारी
पिड़ा हो कि ज्वा आजतक सै न हो ||

बडूळ्यूँ मा रैबार, भेजी नि ऐनी
क्या सुपिन्य्म भी औणों बगत रै न हो ||

कख बिरिडिनि खुटी वो किलै नि बौड़ी होलि
कखि सौतेला बाटोंन भगलै न हो ||

ज्वनि माटू ह्व़ेगे ढुन्गु ह्व़े पराण
कभी सुध ऐ जावु त रगरै न हो ||


अनुवाद :

मेरे आने से किसी को खुशी होती है तो बेशक हो
लेकिन मेरे जाने का दुःख किसी को न हो |

मेरे सुख में हँसने के लिए सभी आमंत्रित हैं
मगर मेरे दुःख में रोने का हक़ किसी को न हो |

एक तो ये पराया मुल्क और उस पर तुम्हारी याद
ऎसी पीड़ा जो आज तक सहन न हुई हो |

हिचकियों में भेजा सन्देश, मगर वो नहीं आये
क्या सपने में भी आने का समय रहा न हो |

कहाँ भटके होंगे वे पैर, क्यों नहीं आये होंगे
कहीं इन सौतेले रास्तों ने बरगलाया न हो |

यौवन हो गया मिट्टी, ये दिल पत्थर हो गया
कभी यक-ब-यक होश आ जाय तो घबराना मत |

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