Sunday, 10 August 2014

'एक देश और मरे हए लोग' की जानिब

एक दौर जहाँ सोमवार की सुबह लैपटॉप कंधे पर टाँगकर दौड़ना होता है ऑफिस और शुक्रवार की शाम होने तक ठोकनी पड़ती हैं उँगलियाँ, कविताओं की जरुरत बड़ी शिद्दत से महसूस करता हूँ | सप्ताह के आखिरी दो दिन और जीवन के शेष दिन सुकून से गुजारने के लिए आवश्यक है कि कविताओं के भीतर रहूँ और कविताएँ मेरे भीतर |  तमाम पगडंडियों से होता हुआ मैं इस राह से भी गुजर गया | विमलेश त्रिपाठी जी की कविताओं की बहुचर्चित किताब 'एक देश और मरे हुए लोग' कुछ ऐसा ही सुकून मुहैया करवाने की एक कुंजी साबित हुई | इन कविताओं से गुजरते हुए मैं विमलेश भाई के जीवन से गुजर गया |
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गाँव से दूर शहर जा बसा कवि अपने साथ थोडा-थोडा गाँव भी लेकर चला है, थोडा सा भाषा में, थोडा यादों में और थोडा अपनी कविता में | बचपन को रचते हुए गाँव का जिक्र आना स्वाभाविक है | यह अलग बात कि शहर में पैदा हुआ बच्चा अपने बचपन को याद करते हुए शहर को ही याद करेगा |

कई वर्षों शहर में गुजारने के बाद भी उसे अपने भीतर दिखाई पड़ता है तो सिर्फ अपना गाँव |

मैं एक गाँव और वही रहा अब तक
कोलकाता नहीं बन सका... |




कविता के जरिये कवि एक लम्बी दूरी तय करना चाहता हैं | वह कविता सिर्फ कविता लिखने के लिए नहीं लिखता, वह कविता लिखता है कविता के लिए |

और एक दिन धुप और आग की परवाह किये बिना
निकल जाना होता है सड़क पर
समय के सबसे अत्याचारी मनुष्यों के जत्थे के खिलाफ
यह परवाह किये बिना कि पीछे कौन आ रहा है 

तब पूरी होती है कोई कविता |

कविता के जरिये विमलेश वंचितों की आवाज बनते हैं | 

कलम बंद करो 
मंच से उतरो 
चलो इस देश की अँधेरी गलियों में
सुनो उस आदमी की बात
उसको भी बोलने का मौका दो कोई 

प्रेम जैसे विषय को, जिसे हमारे साहित्य में लगभग बेकार माना जाता रहा, विमलेश अछूत नहीं मानते | इस संग्रह के हवाले से यह बात पुख्तगी से कही जा सकती है कि विमलेश की पाठशाला में एक खूबसूरत उदास लड़की जरूर रही होगी और जिसकी उदासी ने बार-बार प्रश्न किये होंगे | इन्हीं प्रश्नों के जवाब विमलेश कविताओं के जरिये देते आ रहे हैं |

अन्त में, विमलेश के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता है सरलता. इनकी कविताएँ पढ़ते समय आपकी उँगलियाँ शब्दकोशों के पन्नों को पलटती नहीं रहती. सीधे-सरल शब्दों में अपनी बात रखना और असरदार तरीके से रखना, इस बात की पुष्टि संग्रह की तमाम कविताएँ करती हैं. २०११ में प्रकाशित 'हम बचे रहेंगे' के बाद यह कवि का दूसरा कविता-संग्रह है जिसे प्रकाशित किया है बोधि प्रकाशन, जयपुर ने, २०१३ में |

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