बहुत ज़रूरी है पहुँचना
सामान बाँधते बमुश्किल कहते पिता
बेटी ज़िद करती
एक दिन और रुक जाओ न पापा
एक दिन
पिता के वजूद को
जैसे आसमान से चाटती
कोई सूखी खरदरी ज़ुबान
बाहर हँसते हुए कहते - कितने दिन तो हुए
सोचते कब तक चलेगा यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को
एक दिन और
और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज
बेटी ज़िद करती
एक दिन और रुक जाओ न पापा
एक दिन
पिता के वजूद को
जैसे आसमान से चाटती
कोई सूखी खरदरी ज़ुबान
बाहर हँसते हुए कहते - कितने दिन तो हुए
सोचते कब तक चलेगा यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को
एक दिन और
और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज
वापस लौटते में
बादल बेटी के कह के घुमड़ते
होती बारिश आँखों से टकराती नमी
भीतर कंठ रुंध जाता थके कबूतर का
बादल बेटी के कह के घुमड़ते
होती बारिश आँखों से टकराती नमी
भीतर कंठ रुंध जाता थके कबूतर का
सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते
दुनिया में सबसे कठिन है शायद
बेटी घर से लौटना ।
दुनिया में सबसे कठिन है शायद
बेटी घर से लौटना ।
- चन्द्रकांत देवताले
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